बलौदाबाजार। छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक संस्कृति में सुआ नृत्य-गान का अपना विशेष स्थान है। दीपावली पर्व के दौरान गांवों और शहरों में कन्याएं व महिलाएं समूह बनाकर घर-घर और प्रतिष्ठानों के पास जाकर सुआ नृत्य करती हैं। गीतों के माध्यम से माता लक्ष्मी की आराधना करते हुए सुख-समृद्धि और घर-परिवार में लक्ष्मी के वास की कामना की जाती है।
नीले,पीले, रंग बिरंगे परिधानों में सजी कन्याओं और महिलाओं का समूह जब सुआ गीत गाते हुए पारंपरिक अंदाज में नृत्य करते है, तो दीपावली की खुशियों में लोक संस्कृति की अनूठी छटा जुड़ जाती है। यह केवल नृत्य-गान नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की पीढ़ियों से चली आ रही लोक परंपरा और सामूहिक संस्कृति की पहचान भी है।
हालांकि बदलते समय के साथ सुआ नृत्य-गान की परंपरा में पहले की अपेक्षा अब काफी कमी देखने को मिल रही है। बुजुर्गों के अनुसार पहले दीपावली से करीब 15-20 दिन पहले ही अलग-अलग समूह घर-घर पहुंचने लगते थे और लगातार सुआ गीतों की गूंज सुनाई देती थी। अब ऐसे समूह पहले की तुलना में कम नजर आते हैं।
आधुनिकता के दौर में भी दीपावली पर सुआ नृत्य-गान की यह परंपरा कहीं न कहीं छत्तीसगढ़ की मिट्टी, संस्कृति और लोक आस्था से लोगों को जोड़ती है। जरूरत है कि नई पीढ़ी भी इस विरासत को जाने, समझे और आगे बढ़ाए, ताकि आने वाले वर्षों में दीपावली के साथ सुआ गीतों की मधुर गूंज भी कायम रहे।